http://www.bhaskar.com/2010/04/01/cv-mithun-828976.html
बेंगलुरू. देश में प्रतिभाशाली छात्रों को किस तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है, केरल का छात्र सीवी मिधुन (19) इसका एक उदाहारण है। देश के प्रतिष्ठित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) ने मिधुन की ओर से भेजे गए एक वैज्ञानिक सिद्धांत की अनदेखी कर दी। लेकिन उसने जब इसी तथ्य को बिग बैंग का प्रयोग कर रहे यूरोपीय आर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) को भेजा तो उसकी सराहना की गई।
मिधुन ने वैज्ञानिक सिद्धांत के जरिए दावा किया था कि बिग बैंग प्रयोग के दौरान जब प्रोटान टकराएंगे तो इससे ब्लैक होल नहीं बनेंगे और इसलिए इससे दुनिया को कोई खतरा नहीं है। मिधुन के पिता पुजारी हैं और वह केरल के मलापुरम जिले में स्थित मजलिस आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज में बीएससी फस्र्ट इयर में भौतिकी का छात्र है।
मिधुन ने अपने प्रयोग के दौरान कणों के टकराने के कारण निकलने वाली किरणों से पैदा हुई ऊर्जा की तुलना सूर्य किरणों की ऊर्जा से की। मिधुन का सिद्धांत था कि सूर्य किरणों से निकलने वाली ऊर्जा सर्न के लार्ज ह्रेडोन कोलाइडर (एलएचसी) में कण के टकराने से निकलने वाली किरणों के कारण पैदा हुई ऊर्जा से कहीं अधिक ज्यादा होती है।
मिधुन ने बताया कि उसने करीब छह महीने पहले अपने सिद्धांत को ई-मेल के जरिए बेंगलुरू स्थित आईआईएससी के प्रोफेसर एम. विजयन को भेजा था। विजयन ने इसे इंस्टीट्यूट के हाई एनर्जी फिजिक्स विभाग को भेज दिया। लेकिन मिधुन को संस्थान की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
मिधुन ने दो महीने के इंतजार के बाद अपने सिद्धांत को सीधे सर्न को भेज दिया और वहां के परमाणु भौतिकविद अब्दुल गुरडु की तरफ से तुरंत जवाब भी आ गया।
मिधुन को सर्न की ओर से न सिर्फ सराहना मिली, बल्कि अब उसे बिग बैंग प्रयोग की ताजा जानकारियां भी ई-मेल और मोबाइल के जरिए मिल रही हैं।
